अपनी पहचान | Dreaming Wheels

अपनी पहचान | Dreaming Wheels

‘शांति’ और ‘सफलता’ ये ऐसे दो शब्द है जिनके लिए मैंने काम तो किया पर शायद मेहनत नहीं की। काम सुबह उठने से लेकर रात को 11 बजे तक, घर और एक शिक्षिका की प्राइवेट नौकरी के लिए। एक ऐसी नौकरी जो मैं कभी करना ही नहीं चाहती थी। मुझे याद है जब हम स्कूल में थे और बड़े होकर क्या बनेंगे वाली चर्चा चलती थी तब मैंने हमेशा यही कहा कि मैं टीचर कभी नही बनूँगी। पर कुछ बनने से पहले ही मैने शादी करली। एक साल में मेरी बेटी हुई तब मेरे ग्रेजुएशन का भी एक साल बचा था जो मैंने ढाई साल बाद जैसे तैसे पूरा किया पर अपनी बेटी को बड़ा करने के साथ – साथ मैने अपना एक ही शौक जो की पुस्तकें पढ़ना हैं उसे भी जारी रखा। उसकी वजह से मुझे पढ़ने का बहुत समय मिलता था। जब वो थोड़ी बड़ी हो गई तो मैंने सोचा नौकरी करनी चाहिए और विकल्प बस एक ही था जो पूरी दुनिया की आधी महिलायें अपने लिए सूटेबल मानती हैं, वही टीचर। यकीन न हो तो किसी भी स्कूल चले जाइये और सारे स्टाफ को इकठ्ठा करके पूछ लीजिये की वे सब टीचर क्यों बने ?
ज़्यादातर महिला स्टाफ का कारण यही होगा, हो सकता है कुछ पुरुषों का भी हो पर मैं अभी पुरूषों पर नहीं जाना चाहती क्योंकि हमारे महान भारत देश में महिला और पुरुष को देखने का नज़रिया ही अलग है, दोनो की परवरिश ही अलग ढंग से की जाती है। चलिए इस बात को यही छोड़ देते है, इस बारे में मैं कभी ओर लिखने की सोचूँगी।

तो हम वापस आते हैं मेरी नौकरी की तरफ़ जहाँ मुझे ढेर सारे बच्चे मिले, उनकी शरारतें मिली, नई चीजें सीखने को मिली, उनका प्यार मिला तथा थोड़े बहुत पैसे मिले या कभी ठीक-ठाक भी पर कम मेहनत में नहीं, जब घर के पास नौकरी मिली तो तनख्वाह न के बराबर थी और जब अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी मिली तो घर से 30 किलोमीटर दूर, कुल मिलाकर ये 8-9 घंटे वाली नौकरी मुझे छोड़नी पड़ी। इस तरह मैने 8 साल अलग-अलग जगह काम किया पर मैं संतुष्ट नहीं हुई क्योंकि न तो मुझे अच्छे खासे पैसे मिल रहे थे न ही संतुष्टि। मेरा पुस्तकें पढ़ने का शौक भी लगभग छूट ही गया था पर इस कोरोना वायरस की वजह से कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई की मैने अपनी नौकरी छोड़ दी। शुरू में सच कहूँ तो काफ़ी समय तक ऐसा लगा कि मैने गलती की क्योंकि जब आपके पास पैसे आना बंद हो जाते हैं तो आपके अंदर डर घर करने लगता है पर धीरे-धीरे मुझे सोचने का ज़्यादा समय मिलने लगा और मैने जानने की कोशिश की कि सचमुच मुझे क्या पसंद है, और वह है पुस्तकें पढ़ना। बचपन से ही हमारे घर पर नंदन वन, चंदा मामा, चाचा चौधरी, पिंकी और ऐसी कई पुस्तकें आती थी जिन्हें सभी बच्चे पढ़ते थे, साथ ही साथ मेरे दादाजी को भी पुस्तकों का बड़ा शौक था।

उनके पास ढेरों पुस्तकें थी जो अलमारी में बंद रहती थी पर कुछ पुस्तकें जो बाहर रह जाती थी या मेरे पापा खुद के पढ़ने के लिए रखते थे वो मैं भी पढ़ लिया करती थी और पढ़ने का ये शौक मुझे हमेशा रहा। बचपन में पढ़ी पुस्तकों में सबसे ज़्यादा जो नाम याद रहा वह है ‘ओ हेनरी की कहानियाँ ‘।

मैने हमेशा सोचा कि लाइब्रेरी जॉइन कर लूँ पर नहीं की इसमे गलती किसी और की तो हो ही नहीं सकती, पूरी तरह मेरी है क्योंकि अगर आप अपने शौक पूरा करना चाहते हैं तो आप हमेशा दुसरो पर निर्भर नहीं रह सकते, आपको दृढ़ होना चाहिए, पर मैं असफल रही!

पढ़ते – पढ़ते सोचती थी कि लोग इतना अच्छा कैसे लिख लेते हैं ? इतनी रचनात्मक कल्पना की उड़ान कहाँ से मिलती होगी ? क्या मैं भी लिख सकती हूँ ? पर खुद को हमेशा अक्षम ही पाया। मुझे विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाये रखने और जीवन जीने के लिए सकारात्मकता तो है,पर रचनात्मकता नहीं!

फ़िर भी अपने जीवन में कभी – कभी भर जाने वाली निराशा और कुंठा से छुटकारा पाने के लिए कुछ तो करना ही होता है ताकि आपको नई राह, नई मंज़िल दिखाई दे, जीने के लिए नया लक्ष्य मिल जाए और अगर ये आपके पसंदीदा काम हो तो क्या कहने।

आखिर में मेरा सपना, मैं चाहती हूँ कि मेरा खुद का पुस्तकालय हो जहाँ ढेर सारी पुस्तकें हो और मैं जितनी देर चाहूँ अपनी पुस्तकों के साथ समय बिता सकूँ।

~ तनुश्री हाजरा

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